2047 तक विकसित भारत बनने का सपना केवल आर्थिक विकास से पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए सबसे ज़रूरी है—स्वस्थ और सक्षम नागरिक। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की “अंतिम कड़ी” अभी भी गायब है, और यह कड़ी हमारे स्कूलों में होनी चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) स्कूलों में स्वास्थ्य कार्यक्रमों को अनिवार्य बनाती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि भारत में प्रशिक्षित स्वास्थ्य शिक्षकों का लगभग पूर्ण अभाव है। यदि हम स्कूलों को व्यवहारिक स्वास्थ्य कौशल के केंद्र बना दें, तो हम सिर्फ़ विटामिन या पोषण नहीं सिखाते—बल्कि एक ऐसा “बच्चा-से-माता-पिता पुल” बनाते हैं, जो घरों तक स्वास्थ्य की समझ पहुँचाकर पीढ़ियों से चली आ रही कुपोषण और निष्क्रिय जीवनशैली की समस्याओं को तोड़ सकता है।

लंबी उम्र, लेकिन कम स्वस्थ जीवन

भारत की औसत आयु अब लगभग 70 वर्ष हो चुकी है, जो एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसके पीछे एक चिंताजनक तथ्य छिपा है—स्वस्थ जीवन प्रत्याशा केवल 58 वर्ष है। यानी औसतन एक भारतीय अपने जीवन के अंतिम 12 वर्ष बीमारियों या अक्षमता के साथ बिताता है।

हमने लोगों को ज़्यादा समय तक जीवित रखना तो सीख लिया है, लेकिन उन्हें लंबे समय तक स्वस्थ रखना नहीं। अस्पताल और दवाएं ज़रूरी हैं, पर वे समाधान का अंतिम चरण हैं—शुरुआत नहीं।

बचपन क्यों सबसे महत्वपूर्ण है

वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से बताते हैं कि बचपन में बनी आदतें वयस्क जीवन की नींव तय करती हैं। खाने-पीने और शारीरिक गतिविधि की आदतें यदि बचपन में गलत बन गईं, तो बाद में उन्हें बदलना बेहद कठिन हो जाता है।

बच्चे मुख्यतः दो जगहों से सीखते हैं—घर और स्कूल

घर की सीमाएँ: जब माता-पिता खुद स्वस्थ आदतें नहीं अपना पाते

बच्चे जो देखते हैं, वही सीखते हैं। जो माता-पिता नियमित व्यायाम करते हैं या खेलते हैं, वे अपने बच्चों को सक्रिय जीवनशैली सिखाते हैं। वहीं मोबाइल पर समय बिताने वाले निष्क्रिय माता-पिता भी अनजाने में एक संदेश दे रहे होते हैं।

WHO के अनुसार, बच्चों के पोषण पर माता-पिता की खाने की आदतों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। लेकिन भारत में:

  • केवल 28% वयस्क संतुलित आहार लेते हैं
  • आधे से भी कम लोग आवश्यक शारीरिक गतिविधि करते हैं
  • कई माता-पिता खेल-कूद को पढ़ाई के नुकसान के रूप में देखते हैं
  • लगभग 40% पुरुष तंबाकू का सेवन करते हैं

यह माता-पिता को दोष देने का सवाल नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करने की ज़रूरत है कि बहुत से माता-पिता स्वयं स्वस्थ आदतें विकसित नहीं कर पाए हैं

स्कूल: स्वास्थ्य शिक्षा की सबसे ज़रूरी कड़ी

यहीं से स्कूलों की भूमिका शुरू होती है। NEP 2020 ने इसे पहचाना है, लेकिन सिर्फ़ नीति काफ़ी नहीं—व्यवहारिक क्रियान्वयन ज़रूरी है।

एक प्रभावी स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम:

  • केवल सिद्धांत नहीं, जीवन कौशल सिखाए
  • बच्चों को बताए कि स्वस्थ नाश्ता कैसे चुनें
  • स्वच्छता पर भाषण देने से पहले स्वच्छ शौचालय और साफ पानी सुनिश्चित करे

तीन बड़े लाभ

बच्चों का तत्काल स्वास्थ्य सुधार
भविष्य की पीढ़ियों पर प्रभाव
  1. शोध बताते हैं कि माँ की शिक्षा, परिवार की आय से भी ज़्यादा प्रभावी होती है बच्चों के कुपोषण को रोकने में।

  1. “बच्चा-से-माता-पिता सेतु”
  2. बच्चे घर जाकर माता-पिता की आदतें बदल सकते हैं—खाने से लेकर जीवनशैली तक।

सबसे बड़ी चुनौती: स्वास्थ्य शिक्षक ही नहीं हैं

भारत में स्कूल स्वास्थ्य शिक्षकों की कोई स्थापित व्यवस्था नहीं है। यह केवल कमी नहीं, बल्कि एक पूरी तरह खाली स्थान है।

आंगनवाड़ी और ASHA कार्यकर्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन:

  • आंगनवाड़ी: जन्म से 3 वर्ष
  • ASHA: टीकाकरण और चिकित्सा सेवाएँ

स्कूल स्वास्थ्य शिक्षक 6 से 18 वर्ष तक बच्चों को वैज्ञानिक समझ और व्यवहारिक आदतें सिखा सकते हैं। वे “क्या करना है” से आगे जाकर “क्यों करना है” सिखाते हैं।

सही मॉडल क्या हो सकता है

  • 0–3 वर्ष: आंगनवाड़ी
  • 6–18 वर्ष: स्कूल आधारित अनिवार्य स्वास्थ्य शिक्षा
  • माता-पिता के लिए समय-समय पर स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम

यह निवेश मांगता है—शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम और संरचना। लेकिन विकल्प क्या है? जीवन के अंतिम वर्षों को रोकी जा सकने वाली बीमारियों के साथ बिताना?

निष्कर्ष

स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम भारत की स्वास्थ्य शिक्षा की “अंतिम कड़ी” हैं।
2047 का विकसित भारत केवल सड़कों और इमारतों से नहीं बनेगा, बल्कि स्वस्थ नागरिकों से बनेगा।

और वह नींव बचपन में रखी जाती है—
एक स्वस्थ आदत, एक बच्चे, एक स्कूल से।