न्याय और मोती ( बुद्धिमान तोता )

बहुत समय पहले की बात है, अवध राज्य में एक न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। उसके तीन पुत्र थे — सभी अत्यंत बुद्धिमान, शिक्षित और गुणवान। राजा अपने उत्तराधिकारी की परीक्षा लेना चाहता था। वह जानना चाहता था कि तीनों राजकुमार किसी अपराधी को सजा देने के बारे में क्या सोचते हैं।

राजा की परीक्षा

राजा ने पूछा, “मान लो, अगर कोई व्यक्ति मेरी जान और प्रतिष्ठा की रक्षा का भार उठाए, और वही विश्वासघात कर दे — तो उसे क्या सजा दी जानी चाहिए?”

सबसे बड़े पुत्र ने कहा, “ऐसे व्यक्ति का सिर कलम कर देना चाहिए।” दूसरे ने सहमति जताई, “बिलकुल! विश्वासघात का दंड मृत्यु होना चाहिए।”

परंतु छोटे राजकुमार चुप रहे।

राजा ने पूछा, “तुमने कुछ नहीं कहा, तुम्हारा मत क्या है?”

छोटे राजकुमार ने उत्तर दिया, “महाराज, अगर दोष सिद्ध हो जाए तो मृत्यु उचित सजा है। लेकिन अगर बिना प्रमाण के सजा दी जाए, तो कोई निर्दोष भी मारा जा सकता है।”

राजा: “तो तुम्हारे अनुसार पूरी जांच जरूरी है?”

राजकुमार ने कहा, “हां! इस पर एक कहानी सुनिए…”

हिमशुक - बुद्धिमान तोता

विदर्भ देश का राजा एक अत्यंत बुद्धिमान तोते — हिमशुक — को बहुत मानता था। वह पिंजरे में नहीं रहता था, स्वतंत्र रूप से घूमता और कई भाषाएं बोलता था। राजा महत्त्वपूर्ण निर्णयों में उससे सलाह लेता था।

एक दिन हिमशुक जंगल की ओर उड़ गया और वहाँ उसकी मुलाकात अपने पिता से हो गई। पिता ने उसे घर चलने को कहा। हिमशुक ने राजा से अनुमति मांगी। राजा थोड़ी झिझक के बाद मान गया — “पंद्रह दिन बाद लौट आना।”

हिमशुक अपने माता-पिता के घर गया और उन्होंने प्रेम से उसका स्वागत किया।

अमर फल की खोज

जाते वक्त हिमशुक के पिता ने उसे राजा के लिए उपहार देने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने बताया एक पहाड़ी पर अमरफल का पेड़ है — जिसके फल खाने वाला कभी नहीं मरता और सदैव युवा रहता है। वह फल तोड़कर हिमशुक को दे दिया।

हिमशुक लौटते समय रात में एक पेड़ पर विश्राम करने रुका। उसने फल को एक पेड़ की गुफा में सुरक्षित रखा। दुर्भाग्यवश, उस पेड़ में एक विषैला सांप रहता था। उसने फल को डसा — फल विषैला हो गया।

अनजाने अपराध का आरोप

अगली सुबह हिमशुक ने राजा को वह फल भेंट किया। दरबार में उत्सव हुआ। राजा फल खाने ही वाला था कि प्रधान मंत्री ने सुझाव दिया — “पहले किसी पशु को खिलाकर जांच लें।”

राजा ने फल एक कौवे को खिलाया — वह तुरंत मर गया। राजा को लगा कि हिमशुक ने हत्या का षड्यंत्र रचा है। क्रोधित होकर उसने बिना जांच के हिमशुक को मारने का आदेश दे दिया।

फल का रहस्य

उस फल को शहर के बाहर गाड़ दिया गया। कुछ समय बाद वहाँ एक पेड़ उग आया, जिस पर सुनहरे फल लगे। सभी को लगा ये मृत्युफल हैं — उस पेड़ के चारों ओर पहरा लगाया गया।

परंतु एक दिन दो वृद्ध दंपति — जो अत्यंत निर्धन थे — जीवन से हताश होकर आत्महत्या करने की सोचते हुए उस पेड़ से फल तोड़ लाए और खा लिए।

अगली सुबह उनका जीवन बदल गया — वे दोनों जवान हो गए। राजा को इस चमत्कार की खबर मिली और वह खुद उन्हें देखने गया। यकीन के साथ उसे समझ आया — हिमशुक निर्दोष था। उसने गलती से विषैला फल दिया और राजा ने उसे बिना जांच के मारा।

न्याय का मूल्य

“इसलिए,” छोटे राजकुमार ने कहा, “किसी को सजा देने से पहले पूरी सच्चाई का पता लगाना जरूरी है।”

राजा इस उत्तर से अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने छोटे राजकुमार को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

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नैतिक शिक्षा

यह कहानी हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाती है:

  • बिना प्रमाण के सजा देना न्याय नहीं, अन्याय है।
  • आक्रोश में लिया गया निर्णय पछतावे का कारण बनता है।
  • हर कहानी के पीछे एक सच्चाई होती है — उसे समझना जरूरी है।