भारतीय राजनीति में प्रचार के तरीके तेजी से बदल रहे हैं। पारंपरिक रैलियों और जोशीले भाषणों की जगह अब सेलिब्रिटी-नेतृत्व वाले राजनीतिक इंटरव्यू ले रहे हैं। फिल्मों और टीवी जगत के सितारे अब नेताओं से अनौपचारिक, सजे-संवरे और पहले से तय बातचीत करते नजर आ रहे हैं, जहां जवाबदेही से ज्यादा छवि निर्माण पर जोर होता है।

ये इंटरव्यू मनोरंजन, भावनाओं और ब्रांडिंग का मिश्रण होते हैं, जिनमें अक्सर कठोर राजनीतिक सवाल पीछे छूट जाते हैं। इससे राजनीति, पीआर और मनोरंजन के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

भावनात्मक जुड़ाव या सुनियोजित रणनीति?

सवाल यह है कि क्या ये सेलिब्रिटी इंटरव्यू वाकई मतदाताओं से भावनात्मक जुड़ाव बनाते हैं या फिर राजनीतिक विमर्श को भटकाने की एक सोची-समझी चाल हैं?

रैलियों से कंटेंट क्रिएशन तक

एक समय था जब विशाल जनसभाएं और पार्टी कार्यकर्ताओं की भीड़ चुनावी राजनीति का मुख्य हथियार हुआ करती थीं। आज राजनीति ‘कंटेंट क्रिएशन’ और ‘इमेज कंसल्टेंसी’ के दौर में प्रवेश कर चुकी है।

महाराष्ट्र के निकाय चुनावों के दौरान यह नया पैटर्न साफ दिखाई देता है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से लेकर अन्य शीर्ष नेता अब अभिनेताओं द्वारा होस्ट किए गए इंटरव्यू में नजर आ रहे हैं। बॉलीवुड के अक्षय कुमार से लेकर मराठी सिनेमा की तेजश्री प्रधान, गिरिजा ओक और महेश मांजरेकर तक, कई कलाकार इस ट्रेंड का हिस्सा बन चुके हैं।

एसी हॉल में चाय की चुस्कियों के बीच होने वाली ये ‘गैर-राजनीतिक’ बातचीत, असल में मतदाताओं के मन पर प्रभाव डालने का एक नया तरीका बन गई है।

मनोवैज्ञानिक रणनीति: “आप आम कैसे खाते हैं?”

जब कोई अभिनेता नेता से पूछता है—
“आप आम कैसे खाते हैं?”
“तनाव दूर करने के लिए क्या करते हैं?” या
“सड़कों में देरी क्यों हुई?”

तो यह सिर्फ सामान्य जिज्ञासा नहीं होती। इसके पीछे एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक रणनीति काम करती है, जो नेता को आम और सहज इंसान के रूप में पेश करती है।

‘हेलो इफेक्ट’ और छवि चमकाना

जब कोई लोकप्रिय अभिनेता सम्मान और आत्मीयता के साथ किसी नेता का इंटरव्यू करता है, तो दर्शकों के मन में उस नेता की छवि अपने-आप निखर जाती है। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सॉफ्ट प्रोपेगेंडा का एक परिष्कृत रूप है।

पत्रकारिता बनाम सेलिब्रिटी संवाद

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही तय करना है। लेकिन सेलिब्रिटी इंटरव्यू में यह तत्व अक्सर गायब रहता है।

स्क्रिप्टेड नैरेटिव

पत्रकार फॉलो-अप सवाल पूछते हैं और विरोधाभास पकड़ लेते हैं। इसके विपरीत, सेलिब्रिटी इंटरव्यू अक्सर पूरी तरह स्क्रिप्टेड होते हैं—कैमरा एंगल से लेकर अंतिम एडिट तक—ताकि नेता को ‘लार्जर दैन लाइफ’ दिखाया जा सके।

ज्वलंत मुद्दों की अनदेखी

महंगाई, बेरोजगारी, अधूरी परियोजनाएं और बुनियादी ढांचे की कमी जैसे मुद्दे या तो उठाए ही नहीं जाते या फिर सतही तौर पर छूकर छोड़ दिए जाते हैं।

लोकतंत्र में सवाल “सड़कों में देरी क्यों हुई?” ज्यादा अहम होना चाहिए, न कि “आप आम कैसे खाते हैं?”
जब कलाकार पत्रकारों की जगह लेते हैं, तो जिरह और जवाबदेही खत्म हो जाती है।

मराठी सिनेमा और राजनीति का नया समीकरण

पहले कलाकार राजनीति से दूरी बनाए रखते थे, लेकिन अमोल कोल्हे, आदेश बांदेकर, सुबोध भावे और रितेश देशमुख जैसे उदाहरण बताते हैं कि अब मनोरंजन और राजनीति की सीमाएं धुंधली हो चुकी हैं।

कलाकारों के लिए यह सामाजिक पहचान बनाने का अवसर है, जबकि नेताओं के लिए अभिनेता की लोकप्रियता का शॉर्टकट। ये बातचीत साधारण नहीं, बल्कि सुनियोजित पीआर अभियान होती हैं, जिनमें सिनेमाई लाइटिंग, बैकग्राउंड म्यूजिक और हीरोइक प्रस्तुति शामिल होती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जबरदस्त असर

इन ‘गैर-राजनीतिक’ इंटरव्यू को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिलती है। यूट्यूब और फेसबुक पर इनके व्यूज़ लाखों-करोड़ों में पहुंच जाते हैं।

मतदाताओं की भावनात्मक हेरफेर?

राजनीति तर्क पर आधारित होनी चाहिए या भावना पर?
सेलिब्रिटी इंटरव्यू मतदाताओं की भावनाओं को छूते हैं। जब कोई अभिनेत्री मुख्यमंत्री के निजी संघर्षों की कहानी सुनाती है, तो कई बार लोग प्रशासनिक असफलताओं को नजरअंदाज कर देते हैं।

खासतौर पर युवा वर्ग, जो रील्स और ग्लैमर को ज्यादा महत्व देता है, इस तरह के कंटेंट से जल्दी प्रभावित हो जाता है।

निष्कर्ष

किसी नेता के निजी जीवन को जानने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब चुनावी मौसम में इसे ब्रांडिंग टूल की तरह इस्तेमाल किया जाए, तो मतदाताओं को सतर्क रहना चाहिए।

नेताओं का जनता से संवाद जरूरी है, लेकिन जब कोई बड़ा सितारा नेता का इंटरव्यू करता है, तो वह अक्सर जनता के सवालों की आवाज बनने के बजाय नेता के स्क्रिप्टेड जवाबों का माध्यम बन जाता है।

नेता को इंसान के रूप में समझना हो—तो सेलिब्रिटी इंटरव्यू ठीक हैं।

लेकिन नेता को जनप्रतिनिधि के रूप में परखना हो—तो आज भी सशक्त पत्रकारिता ही एकमात्र रास्ता है।