वक़्त का सदुपयोग - एक प्रेरणादायक कहानी
विक्रम एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। उसकी पढ़ाई एक सामान्य सरकारी स्कूल में हो रही थी। उसके पिता एक छोटे से किराने की दुकान चलाते थे और माँ गृहिणी थीं। घर का माहौल साधारण था, लेकिन माता-पिता का सपना था कि विक्रम कुछ बड़ा करे।
विक्रम में बुद्धिमता थी, लेकिन ध्यान नहीं। वह समय को हल्के में लेता। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और गेम्स उसका अधिकतर समय खा जाते। पढ़ाई से मन हट चुका था। दोपहर को सोना, शाम को दोस्तों के साथ घंटों घूमना और रात में देर तक वीडियो देखना उसकी दिनचर्या बन चुकी थी।
पढ़ाई के लिए समय नहीं बचता। माता-पिता समझाते, लेकिन वह टाल देता —
“अभी तो समय है, कल से शुरुआत करूंगा।”
वह 'कल' कभी नहीं आया।
10वीं की बोर्ड परीक्षा निकट आ गई। स्कूल में टेस्ट शुरू हुए और विक्रम के अंक बेहद कम आए। शिक्षक ने उसे बुलाकर कहा,
“तुम समझदार हो, लेकिन अपना समय बर्बाद कर रहे हो। यह तुम्हारे भविष्य के साथ अन्याय है।”
विक्रम के दोस्तों ने भी उसकी मज़ाक उड़ाई। माता-पिता की आँखों में चिंता थी। लेकिन विक्रम फिर भी कहता,
“मैं आखिरी समय पर पढ़ लूंगा।”
परीक्षा आई, और गई।
जब परिणाम आया, तो विक्रम के हाथों से मानो ज़मीन खिसक गई। वह फेल हो गया। दोस्तों ने दूरी बना ली। परिवार का वातावरण तनावपूर्ण हो गया। पिता ने दुकान पर बुलाकर कहा,
“तुम्हें दुकान संभालनी है अब। हमें और पढ़ाई पर पैसे नहीं खर्च करने।”
विक्रम ने चुपचाप सिर झुका लिया। दिल में अफसोस था, लेकिन खुद को दोष देने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था।
एक दिन दुकान पर एक ग्राहक आया, जो वहीं के कॉलेज का प्रोफेसर था। वह विक्रम से बात करने लगा। उसकी भाषा, उसकी आंखों में आत्मविश्वास था। विक्रम से पूछा,
“तुम यहाँ दुकान पर हो, लेकिन क्या पढ़ाई की थी?”
विक्रम ने शर्म से कहा, “सर, 10वीं में फेल हो गया।”
प्रोफेसर ने कहा, “वक़्त खो गया तो क्या हुआ? अगर तुम्हारे अंदर सच्ची चाह है, तो यह दुकान भी तुम्हारे लिए क्लासरूम बन सकती है। सवाल है — क्या तुम वक़्त का सदुपयोग करना चाहते हो?”
उस दिन विक्रम पूरी रात जागता रहा। उसने आत्ममंथन किया —
उसने जो समय गंवाया, उसे कोई लौटा नहीं सकता था।
लेकिन आगे का समय तो उसके हाथ में था।
अगली सुबह, उसने पिता से कहा,
“मैं दुकान चलाऊंगा, साथ ही खुद से पढ़ाई करूँगा। मुझे एक साल दो।”
पिता ने निराशा में कहा, “करना है तो साबित करके दिखाओ।”
विक्रम ने दुकान पर किताबें रख लीं। जब ग्राहक नहीं होते, तब वो पढ़ता। यूट्यूब पर लेक्चर सुनता, पुराने प्रश्नपत्र हल करता।
दोस्तों ने मज़ाक उड़ाया, लेकिन इस बार विक्रम मुस्कुरा देता था।
धीरे-धीरे उसमें बदलाव आने लगा। उसकी भाषा में आत्मविश्वास, आंखों में चमक, और दिमाग में स्पष्टता आ गई।
उसने 'वक़्त' को अपनी सबसे बड़ी ताक़त बना लिया।
एक साल बाद उसने फिर परीक्षा दी — और 85% अंक लाकर सबको चौंका दिया। स्कूल वाले बोले,
“ये तो वही विक्रम है जिसे हमने लगभग छोड़ ही दिया था!”
कॉलेज में प्रवेश मिला। कुछ वर्षों बाद वह इंजीनियर बना और एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिली।
उसके पिता की आंखों में गर्व था।
माँ की मुस्कान में संतोष था।
और विक्रम के दिल में सिर्फ एक मंत्र था —
वक़्त का सदुपयोग ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।
कहानी से सीख:
- वक़्त किसी का इंतजार नहीं करता।
- जो इसे समझ जाता है, वह जीवन में कभी असफल नहीं होता।
- कोई भी परिस्थिति बदलाव का माध्यम बन सकती है, अगर हम समय का सही प्रयोग करें।

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