तेनालीराम और सम्राट कृष्णदेव राय: सच्चाई की विजय

बहुत समय पहले दक्षिण भारत में एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य था—विजयनगर। इस राज्य के राजा थे महाराज कृष्णदेव राय। वे एक न्यायप्रिय, उदार और प्रजावत्सल शासक थे। उन्होंने अपनी प्रजा के कल्याण हेतु कई कार्य किए जिससे पूरा राज्य सुख-शांति और समृद्धि से भर गया था। उनकी प्रजा उन्हें अत्यंत आदर और प्रेम से देखती थी।

महाराज कृष्णदेव राय का दरबार विद्वानों और गुणवान व्यक्तियों से भरा रहता था। उनमें से एक विशेष नाम था—तेनालीराम। तेनालीराम ना सिर्फ बुद्धिमान थे, बल्कि वे अपने व्यंग्य और सच्चाई पर आधारित बातों के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी बातों में एक खास गहराई होती थी, जिससे वे आसानी से लोगों का मन जीत लेते थे। सम्राट कृष्णदेव राय उनसे अत्यंत प्रसन्न रहते थे और तेनालीराम को विशेष सम्मान देते थे।

एक दिन महाराज अपने दरबारियों के साथ भ्रमण हेतु निकले। घूमते-घूमते वे एक सुंदर उद्यान में पहुँच गए। वहाँ रंग-बिरंगे फूल खिले थे जो वातावरण को सुगंधित और सुखद बना रहे थे। राजा मुस्कुरा उठे और बोले—"देखो कितने सुंदर फूल खिले हैं। क्या कोई बता सकता है कि इनकी मुस्कान क्या कहती है?"

एक दरबारी बोला, “महाराज! ये फूल कह रहे हैं कि हम चाहे जितने सुंदर हों, आपकी महानता के आगे कुछ नहीं हैं।” दूसरा दरबारी बोला, “यह कह रहे हैं कि अगर हमें एक हार में पिरोकर महाराज के गले में डाल दिया जाए, तो हमारा जीवन सफल हो जाएगा।”

राजा ने तेनालीराम की ओर देखा और बोले, “तेनाली, तुमने अभी तक कुछ नहीं कहा।”

तेनालीराम मुस्कुरा कर बोले, “महाराज! फूलों का स्वभाव ही मुस्कुराना है। वे न किसी राजा को देखते हैं, न किसी रंक को। कोई उनकी प्रशंसा करे या आलोचना—वे हर परिस्थिति में मुस्कुराते हैं।”

यह सुनकर सम्राट बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने एक गुलाब का फूल तोड़ा और तेनालीराम को भेंट में दे दिया। उन्होंने कहा, “तुमने बिना चापलूसी के सत्य कहा, और यही तुम्हारी विशेषता है।”

तेनालीराम की सत्यवादिता से सम्राट प्रभावित थे, लेकिन दरबार में सभी दरबारी उनसे खुश नहीं थे। कई दरबारी उनकी सच्ची बातें सहन नहीं कर पाते थे और उनके प्रभाव को घटाने की कोशिश में लगे रहते थे।

एक दिन एक दरबारी ने भोजन के रूप में दरबारियों को अपने घर आमंत्रित किया। उसने तेनालीराम को भी बुलाया। वहाँ उसने बड़ी मात्रा में तरबूज मंगवाए।

खाना शुरू हुआ। सभी अपने-अपने तरबूज खाने लगे। उसी समय उस दरबारी ने एक चाल चली। उसने तरबूज के गूदे खुद खाए और उसके छिलके तेनालीराम की थाली में डालता गया ताकि ऐसा लगे कि तेनालीराम बहुत ज़्यादा खा रहे हैं।

जब भोजन समाप्त हुआ तो उस दरबारी ने कहा, “मित्रों! देखिए, तेनालीराम कितने भूखे थे। उनकी थाली में सबसे अधिक छिलके पड़े हैं। इसका मतलब है कि उन्होंने सबसे ज्यादा तरबूज खाए।”

तेनालीराम मुस्कराए और बोले, “दरबारी महोदय! मैंने केवल गूदा खाया और छिलके फेंक दिए, इसीलिए मेरे सामने छिलके हैं। आप इतने भूखे थे कि आपने छिलकों तक खा लिए—इसलिए आपकी थाली खाली है!”

यह सुनते ही दरबारियों के बीच हँसी फैल गई और वह दरबारी शर्म से सिर झुका गया।

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कहानी से सीख

तेनालीराम की बुद्धिमत्ता और सत्य के प्रति निष्ठा उन्हें विशेष बनाती है। उन्होंने कभी भी चापलूसी नहीं की, न ही झूठ बोलकर किसी का दिल जीतने की कोशिश की। उन्होंने अपने व्यवहार से यह सिद्ध कर दिया कि सच्चाई चाहे कितनी भी कटु क्यों न हो, वह अंततः विजय प्राप्त करती है।

इस कहानी से हम यह सीख सकते हैं कि:

  • सत्य की राह कठिन होती है, लेकिन वह सदैव विजयी होती है।
  • चतुराई सिर्फ चालाकी में नहीं, बल्कि साहस और ईमानदारी में भी होती है।
  • किसी के सामने झूठ बोलकर वाहवाही पाने की बजाय, सच्चे विचार रखना अधिक मूल्यवान है।