यह कहानी मौर्य काल के एक बहुत ही प्रभावशाली प्रसंग पर आधारित है, जो हमें जीवन की कीमत और अहिंसा का महत्व समझाती है। यहाँ इस कहानी का विस्तृत और सुंदर हिंदी रूपांतरण है:
मगध के सम्राट बिंदुसार के दरबार में एक बार एक गंभीर प्रश्न उठा। सम्राट ने अपने मंत्रियों और सभासदों से पूछा, "हमारे राज्य की खाद्य समस्या को हल करने के लिए दुनिया में सबसे सस्ती वस्तु क्या है?"
दरबार में चर्चा शुरू हो गई। किसी ने चावल कहा, तो किसी ने गेहूं या बाजरा। लेकिन अधिकांश लोगों का मानना था कि अनाज उगाने में बहुत मेहनत, समय और पानी लगता है, इसलिए इसे 'सबसे सस्ता' नहीं कहा जा सकता। तभी शिकार के शौकीन एक सामंत ने खड़े होकर कहा, "महाराज, मेरे विचार में 'मांस' दुनिया की सबसे सस्ती वस्तु है। इसे पाने के लिए न तो बीज बोना पड़ता है और न ही फसल काटनी पड़ती है, बस एक शिकार और भोजन तैयार।" अन्य सामंतों ने भी इस बात का समर्थन किया।
प्रधानमंत्री आचार्य चाणक्य यह सब चुपचाप सुन रहे थे। जब सम्राट ने उनकी राय माँगी, तो उन्होंने कहा, "राजन्, मैं अपना उत्तर कल सुबह प्रमाण के साथ दूँगा।"
चाणक्य की परीक्षा
उसी रात, आचार्य चाणक्य सबसे पहले उसी सामंत के घर पहुँचे जिसने मांस को सबसे सस्ता बताया था। चाणक्य को अचानक अपने द्वार पर देख सामंत घबरा गया। चाणक्य ने गंभीर स्वर में कहा, "सामंत जी, महाराज बिंदुसार की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है। राजवैद्य ने कहा है कि यदि किसी कुलीन व्यक्ति के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए, तो महाराज के प्राण बच सकते हैं। मैं आपके पास वही लेने आया हूँ और इसके बदले में आपको राजकोष से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं दी जाएंगी।"
यह सुनते ही सामंत के हाथ-पांव फूल गए। वह चाणक्य के चरणों में गिर पड़ा और गिड़गिड़ाते हुए बोला, "आचार्य, मुझे क्षमा करें! मेरे प्राण ले लेंगे तो इन स्वर्ण मुद्राओं का मैं क्या करूँगा? आप मुझसे और एक लाख मुद्राएं ले लें, पर कृपया किसी और के पास जाएँ।" चाणक्य ने उससे धन लिया और बारी-बारी से उन सभी सामंतों के पास गए जिन्होंने मांस को सस्ता बताया था।
हैरानी की बात यह थी कि हर सामंत ने अपने जीवन के बदले चाणक्य को लाखों स्वर्ण मुद्राएं दे दीं, पर कोई भी दो तोला मांस देने को तैयार नहीं हुआ।
सम्राट को मिला उत्तर
अगले दिन सुबह, चाणक्य सम्राट के सामने दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के साथ उपस्थित हुए। सम्राट हैरान थे कि इतनी संपत्ति कहाँ से आई?
चाणक्य ने शांत स्वर में कहा, "महाराज, यह धन उसी 'दो तोला मांस' की कीमत है जिसे कल इस दरबार में सबसे सस्ता बताया गया था। अपने दो तोला मांस को बचाने के लिए इन सामंतों ने अपनी सारी संपत्ति तक दांव पर लगा दी। सच्चाई यह है कि इस संसार में 'जीवन' से कीमती कुछ भी नहीं है और जिसे हम खरीद नहीं सकते, वह सस्ता कैसे हो सकता है?"
कहानी का सार:
चाणक्य ने समझाया कि मनुष्य अपने प्राण बचाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सब लगा देता है, क्योंकि उसे अपना जीवन प्रिय है। ठीक उसी तरह, मूक पशुओं को भी अपना जीवन उतना ही प्रिय है। फर्क सिर्फ इतना है कि वे अपनी व्यथा बोलकर सुना नहीं सकते और अपनी हत्या के खिलाफ मुकदमा नहीं लड़ सकते।
निष्कर्ष: यदि आप किसी को जीवन दे नहीं सकते, तो आपको किसी का जीवन लेने का भी कोई अधिकार नहीं है।

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