पिंजरे का शेर और चालाक लोमड़ी – नैतिक कहानी

बहुत समय पहले की बात है, एक शेर को लोगों ने पकड़कर लोहे के एक मजबूत पिंजरे में बंद कर दिया था। वह कई दिनों से उसी पिंजरे में कैद था, भूखा-प्यासा और असहाय। एक दिन एक पंडित वहाँ से गुजर रहा था। जैसे ही उसकी नजर शेर पर पड़ी, वह डर गया और पीछे हटने लगा।

शेर विनम्रता से बोला,

"रुको महाराज! कृपया मेरी बात सुनिए। मैं कई दिनों से इस पिंजरे में बंद हूँ। मुझे बहुत प्यास लगी है। कृपया मुझे बाहर निकाल दीजिए। मैं सिर्फ पानी पीने जाऊँगा और वादा करता हूँ कि वापस आकर फिर से पिंजरे में चला जाऊँगा।"

पंडित पहले तो डर गया और बोला,

"नहीं, तुम मुझे खा लोगे।"

शेर बोला,

"मालिक, ऐसा न सोचिए। मैं वादा करता हूँ कि मैं आपको कुछ नहीं कहूँगा। मैं केवल पानी पीने जाऊँगा और फिर लौट आऊँगा।"

शेर की करुणामय बातों में आकर पंडित ने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। शेर बाहर निकला, अपनी आँखें चमकाते हुए बोला,

"अब मैं बहुत भूखा हूँ। पहले तुम्हें खा लूँगा, फिर पानी पीने जाऊँगा।"

पंडित घबरा गया।

"अरे! तुमने वादा किया था कि तुम मुझे नहीं खाओगे। यह विश्वासघात है।"

शेर बोला,

"भूख के आगे वादा मायने नहीं रखता। मैं तुम्हें खा जाऊँगा।"

पंडित ने थोड़ा सोचते हुए कहा,

"ठीक है, लेकिन इससे पहले हमें किसी तीसरे से सलाह लेनी चाहिए कि तुम्हारा यह काम सही है या गलत। अगर वह कहे कि तुम मुझे खा सकते हो, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा।"

शेर मान गया।

कुछ ही दूरी पर एक चालाक लोमड़ी टहल रही थी। पंडित ने उसे आवाज दी,

"लोमड़ी भाई! इधर आइए। एक न्याय करना है।"

लोमड़ी आई। पंडित ने पूरी घटना बताई कि कैसे उसने शेर को पिंजरे से बाहर निकाला और अब वह उसे खाना चाहता है।

लोमड़ी थोड़ी उलझन में दिखी और बोली,

"मैं समझ नहीं पा रही। इतना बड़ा शेर इस छोटे पिंजरे में कैसे आ सकता है?"

शेर बोला,

"मैं इसी पिंजरे में था, देखो!"

लोमड़ी बोली,

"मैं अब भी यकीन नहीं कर पा रही। क्या आप फिर से पिंजरे में जाकर दिखा सकते हैं?"

शेर को यह बात तर्कसंगत लगी। वह पिंजरे में वापस चला गया। लोमड़ी ने मुस्कराते हुए पंडित की तरफ इशारा किया और बोली,

"अब दरवाज़ा बंद कर दीजिए।"

पंडित ने बिना देर किए पिंजरे का दरवाज़ा बंद कर दिया।

लोमड़ी ने कहा,

"अब यह शेर वहीं रहेगा जहाँ होना चाहिए था। यह तुम्हारे विश्वास का अपमान करने वाला है और ऐसे हिंसक जीव पर भरोसा नहीं करना चाहिए। चलिए, अब यहाँ से चलें।"

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कहानी से शिक्षा

  • इस कहानी से हमें दो महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं:
  • कभी भी किसी हिंसक या विश्वासघाती व्यक्ति पर आँख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए।
  • जो लोग आप पर भरोसा करते हैं, उनके विश्वास को तोड़ना पाप है। अगर आपने किसी पर दया दिखाई है, तो उस दया का सम्मान किया जाना चाहिए।